प्रिय जोया,
लड़ते-झगड़ते, रूठते-मनाते आज 30 जुलाई को हमारी दोस्ती 18वें बरस में दाखिल हो चुकी है।
सोचता हूँ — 30 जुलाई, 2008 को सूनी कॉलेज के नोटिस बोर्ड के बाहर हमारे संयोगवश मिलन से लेकर, रोज़मर्रा की अनगिनत बातों, रूठने-मनाने, खामोशियों और दूरियों से गुजरते हुए एक-दूसरे के जीवन में लौटकर नजदीकियां बढऩे तक का ये सफऱ कितना लम्बा, और फिर भी कितना गहरा रहा है। मगर जब पीछे मुड़कर देखता हूँ तो सब-कुछ मानो कल ही की बात लगती है — जैसे समय ने हमारी कहानी को खुद अपनी हथेलियों पर लिखा हो।
इस सफर में न जाने कितने उतार-चढ़ाव आए। मौसम बदले, हालात बदले, मगर, हमने हर बाधा को पार कर लिया। हर मोड़ पर, किसी न किसी रूप में, हम एक-दूसरे के साथ ही रहे।।
तुम्हें याद है, अपनी बात नहीं मानने से नाराज होकर गुस्से में जब मैंने तम्हारी जिंदगी से 'चले जाने' की बात कही, और फिर तुमने खामोशी के साथ बस दो शब्द कहे.. 'मत जाओ'।
तुम्हारे यह दो शब्द 'मत जाओ' मेरे दिल में इतने गहरे तक असर किए हैं कि मुझे लगता है — इससे बेहतर शब्दों में कोई अहसास बयां हो ही नहीं सकता।
मैंने भले ही इस दोस्ती-प्रेम-इश्क में तुम्हारे लिए हजारों शब्द लिखे हों, लेकिन तुम्हारे इन दो शब्दों का वजन मेरे हजारों शब्दों से कहीं ज्यादा है.. बहुत ज्यादा।
मेरे अब तक जीवन के सबसे खूबसूरत शब्द हैं — 'मत जाओ'..।
इन दो शब्दों का अहसास मेरे अंतर्मन के भीतर तक उतर गया।
यकीन करना यह बात लिखते हुए मेरी आंखें फिर डबडबा गई है।
कितनी खूबसूरती के साथ तुमने महज दो शब्दों में उतना कह दिया, जितना कहने में मैंने लगभग एक किताब जितने शब्द खर्च किए हैं।
इसीलिए मुझे तुमसे प्यार है.. मुझे तुम्हारे इस खूबसूरत किरदार से प्यार है।
ठीक तीन दिन पहले हमारी दोस्ती में जो तूफान आया था, एकबारगी तो लगा था कि हमारी यह कश्ती सागर की अनंत गहराइयों में डूब जाएगी। मगर हमेशा की तरह तुमने फिर इस कश्ती को डूबने से बचा लिया।
उस दिन कुछ ही घण्टों में सब कुछ उजड़ जाने के खयाल ने मुझे बेहद डरा दिया था। सुबह.. दोपहर... शाम... रात.. देर रात.. और फिर पूरी रात तक... एकांत में जाकर.. खूब... खूब रोया.. जार.. जार.. फूट-फूटकर..। इतना गहरा प्यार यूं कुछ क्षण में खो देने का अहसास कितना भयावह होता है, इसका अहसास उसी शख्स को हो सकता है, जो इससे गुजरा हो।
उधर, तुम भी तो टूटी थी। तुम्हें रोते सुना.. सुबकते हुए गालों पर ढल आए आंसुओं को महसूस किया.. तुम्हारे रोने के बाद चीखने-चिल्लाने से लेकर फिर ........ खामोश होने तक के अहसास ने मेरी रूह तक को निचोड़ दिया।
मुझे लगता है अपनी-अपनी जिद मनवाने पर अड़े रहने के कारण एक-दूसरे का दिल दुखाने वाले इन दो-तीन दिनों में हम दोनों ने दूर होने की जी तोड़ कोशिश कर ली।
तुमने मुझे ब्लॉक किया... पर तुमसे ही रहा नहीं गया.. उधर, मैंने ब्लॉक होने के बावजूद हर मिनिट तुम्हें मैसेज किया...
सोचो दिल को कितना अटूट भरोसा था तुम पर — कि तुम मुझे 'ब्लॉक' करके नींद ले ही नहीं सकती हो...
बिना किसी कनेक्शन के भी 'दिल' की बात 'दिल' तक पहुंच जाती है, यह विश्वास उस वक्त मजबूत हुआ जब देर रात दिल का भरोसा ही जीता। तुमने वापस 'अनब्लॉक' किया और जैसे मेरी सांसें लौटीं।
हालांकि अगले दिन मैंने भी तुम्हें ब्लॉक करने का कहा... पर मैं कर नहीं पाया। इतनी हिम्मत कहाँ थी? मेरा दिल तो यह सोचकर ही कांप उठा कि अगर कभी तुमने पलटकर देखा और मैं वहाँ ना रहा तो ?
यह सब करते रहने से जब हम दोनों के ही दिलों में 'टूटन' महसूस हुई.. तीव्र वेदना के कारण उपजे इस दर्द की इंतिहा से हम दोनों ही टूट गए.. हम दोनों के दिल आहत होने के बावजूद उस शख्स से दूर होने को बिल्कुल तैयार नहीं हुए, जिसके कारण ही वह आहत थे।
शायद यह वही लम्हा था, जब हमें समझ आया कि हमारा रिश्ता कितना गहरा हो चुका है, उसकी जड़ें अब इतनी गहरी हैं... जिनको उखाड़ फेंकना अब हमारे ही बस में नहीं रहा। इसका अहसास इसी तूफान में हुआ।
तमाम झगड़ों और नाराजगियों के बावजूद तुमने मैसेज किया — 'Happy 30 july', जिसको देखने के लिए मैं रात से तरस सा गया था। और फिर जब तुमने कहा - लंच में बात करना। जवाब में मैंने झूठ बोल दिया - मैं तुमसे बात नहीं कर पाऊंगा।
फिर भी तुमने कॉल किया। और देखो ना बात नहीं करने का कहने वाला मैं भी तुम्हारा कॉल अटेंड करने से अपने आप को रोक नहीं पाया। कितना भरोसा है ना हमें अपनी दोस्ती पर।
मैं जब कह रहा हूं कि मैं बात 'नहीं' कर पाऊंगा, इस 'नहीं' का मतलब 'हां' है।यह सिर्फ तुम्हारा दिल ही समझता है — कि मैं इस वक्त तुमसे ही बात करना चाहता हूं। शायद दुनिया में यह इकलौते ऐसे कोड-वर्ड हैं, जिसे केवल वह दिल ही डि-कोड कर सकते हैं, जो आपस में गहरे तक जुड़े होते हैं।
यही हमारी दोस्ती का सबसे गहरा सबूत है — हम जो कहते हैं, वह सिर्फ लफ्ज़ होते हैं, लेकिन समझना क्या है, वह केवल हमारा दिल जानता है।
जब मैंने कहा कि — रूठने वाला शख्स अलग नहीं होना चाहता, वह तो बस यही चाहता है कि जिससे वह रूठा है, वह उसे मना ले।
और फिर देखो ना तुमने मैसेज में कह दिया — "तुम आज ... आ जाओ"। बिना भूमिका, बिना बहाने के। क्योंकि तुमको यकीन था कि मैं आ ही जाऊंगा। मैंने मैसेज देखा.. मुस्कुराया और इससे पहले कि दिल में कोई और खयाल आए मैं उसी क्षण तुम्हारी तरफ दौड़ पड़ा... सारी नाराजगी, सारा गुस्सा... तुम्हारी यह एक बात सुनते ही बह गया।
वह क्षण अनमोल था। उस पल जो अनुभव हुआ, उसे मैं सच में लिख नहीं सकता। बस महसूस किया मैंने तुम्हें। तुम्हारे मन को। तुम्हारे खयालों में डूबा जब मैं तुम्हारी तरफ अपनी गाड़ी को दौड़ा रहा था, तब रास्ते में हो रही बारिश की बूंदें मुझे अंदर तक भिगो रही थी।
और जब मैंने तुम्हारे घर का दरवाजा खोला.... तो वक्त जैसे वहीं ठहर गया था। दरवाजे के पास पेड़ की ओट लेकर उत्सुकता से मेरा इंतजार करते हुए तुम मेरे ठीक सामने खड़ी थी — बिल्कुल मेरी नजऱों के जरिए सीधे दिल में उतर जाने के लिए तैयार। तुम्हारी अप्रतिम खूबसूरती को देखकर मैं अवाक था।
घनघोर बादलों से भरा आसमान, ताजा बारिश में भीगी धरती की महक, शाम की हल्की ठंडक और खूबसूरत ड्रेस में... चाय का मग लिए सबसे खूबसूरत — तुम।
गहरे काले घने खुले बाल और चेहरे पर प्यार भरा आत्मविश्वास। उस पर हल्की से मुस्कुराहट। उफ्फ !!
यकीन करना, यह मेरे अब तक के जीवन का सबसे खूबसूरत दृश्य है, जो मेरी आंखों से होकर मेरी रूह में उतर गया।
सच कहूं तो उस वक्त मन किया कि तुम्हें बाहों में भर लूं और तुमसे लिपटकर अपनी गलतियों-नादानियों के लिए माफी मांगकर कह दूं कि — "मैं अब तुमसे दूर होकर कभी कहीं नहीं जाऊंगा। मेरी जिन्दगी की सारी ख्वाहिशें बस तुम तक आकर समाप्त हो जाती है।"
हालांकि मैं ऐसा चाहकर भी कर नहीं पाया। मगर तुम्हारे-मेरे बीच एक हल्की सी मुस्कुराहट ने उन सभी कड़वाहटों को एक पल में भूला दिया, जो हाल के दिनों में हमारे दिलों में जाने-अनजाने आ गई थी। उस एक मुस्कुराहट के साथ हमने बिना कुछ कहे अपनी-अपनी शिकायतों को दिलों से बाहर निकाल फेंका था।
फासले उन्हें क्या जुदा करेंगे, जो बसते ही एक-दूसरे में हो !!
मैं तुम्हारे इस घर में पहली दफा आया, लेकिन सब कुछ कितना अपना सा लगा था। उस समय तुम्हारी सहजता ने मेरा दिल जीत लिया। मैं वहां रखी हर चीज को छूकर तुम्हें महसूस करना चाहता था। तुमने गौर किया हो तो तुम्हें याद आ जाएगा कि तुमसे बात करते हुए मैं बस तुम्हें ही एकटक देख रहा था। मेरा ध्यान तुमसे हट ही नहीं रहा था।
उस पल को मैं अपनी आंखों में भर लेना चाहता था, सहेज लेना चाहता था - ताकि जब कभी जिंदगी उदास हो, मैं बस पलकों को बंद करूँ और तुम्हारा वो रूप देख लूँ —
जहाँ तुम हो,
बारिश है,
चाय की ख़ुशबू है,
और एक दीवाना-सा मैं...
जो बस तुम्हें देखे जा रहा है, और सोच रहा है —
"क्या इससे ज़्यादा ख़ूबसूरत भी कुछ हो सकता है?"
आज की हमारी इस मुलाकात की वजह 30 जुलाई की तारीख थी। मुझे पहले की 30 जुलाई भी याद है, जहां मैं अक्सर उसी कॉलेज के नोटिस बोर्ड के पास जाकर तुम्हें महसूस किया करता था। लेकिन अब यह दिन मेरे लिए ही नहीं, तुम्हारे लिए भी अहम दिन बन चुका है। इसीलिए तुमने आज मुझे अपने घर बुलाया था। इससे बड़ा सबूत हमारी दोस्ती की मजबूती का क्या होगा।
जब तुम्हारे कमरे में कैलेण्डर पलटते हुए मैंने शरारत से कहा कि — "अच्छा आज 30 जुलाई है। मुझे तो याद ही नहीं है।" उस वक्त चुपके से मैंने तुम्हारे चेहरे पर आई मुस्कुराहट को देखा था। उस मुस्कुराहट ने मुझे तुम्हारे दिल में छिपे गहरे प्रेम का अनुभव करा दिया था। तुम्हारी उस मुस्कुराहट पर मैं अपना सब कुछ लुटाने को तैयार हूं।
अब जब यह तूफान गुजर गया और हमारा रिश्ता सही सलामत है तो इस रिश्ते से लिपटकर मैं तुमसे कह देना चाहता हूं कि मैं अपनी जिन्दगी की आखिरी सांस तक इस रिश्ते का खयाल रखूंगा.. हम दोनों इस रिश्ते को प्यार से संवार सकते हैं... ताकि फिर किसी तूफान में यह कमजोर न पड़े।
कश्ती चलाने वालों ने जब हार के दी पतवार हमें..
लहर-लहर तूफान मिले और संग-संग मझधार हमें..
फिर भी दिखलाया है हमने, और आगे भी दिखा देंगे..
इन हालातों में करना आता है, दरिया पार हमें...
तुम्हारे साथ मेरी यह दोस्ती भी ऐसे ही शुरू हुई थी — अनजाने, अनगढ़े, अनकहे अहसासों से। न मैं तब प्रेम को जानता था, न उसकी अभिव्यक्ति को... लेकिन तुम्हारे पास होते हुए भी जो ख़ालीपन मेरे भीतर था, वो मुझे आज समझ आता है — वो प्रेम था।
एक ऐसा प्रेम जो वक्त के साथ बड़ा हुआ, गहरा हुआ... लेकिन आज भी अधूरा है। और शायद तुम्हारे 'ना' कहने के बाद भी जिंदा है, क्योंकि इसमें कोई शर्त नहीं थी। बस तुम्हारा साथ था — कभी दोस्त की तरह, कभी हमराज़ की तरह, कभी बिना नाम वाले रिश्ते की तरह।
तुम्हारे इनकार ने मुझे तोड़ नहीं दिया, बल्कि मुझे यह सिखा दिया कि सच्चे प्रेम में अधिकार नहीं होता, अपेक्षा नहीं होती, बस समर्पण होता है।
मैं जानता हूँ — तुमने दोस्त बनकर जो निभाया है, वो शायद प्रेमिका बनकर भी हर कोई नहीं निभा पाता। मैं इस बात से खुश हूँ कि तुम मेरी जिंदगी में हो — चाहे जिस भी रूप में। तुम्हारा होना, मेरा सबसे बड़ा तोहफ़ा है।
लेकिन...
मन का एक कोना अब भी सूना है।
वह कोना जो चाहता था कि एक दिन तुम कहो — 'हाँ, मैं भी...'
कि तुम भी उन अनकहे लम्हों को समझो जो तुमने भी मेरे साथ बिताए हैं...
कि तुम भी उस सन्नाटे को पढ़ो जो मैंने हर मुस्कुराहट के पीछे छुपा रखा।
क्या तुम्हें कभी यह एहसास हुआ है कि मैंने तुमसे कुछ नहीं मांगा, सिवाय एक पल की मुस्कान के, एक नजऱ के, एक स्पर्श के — जो कह दे कि तुम मेरी हो, सिर्फ मेरी ?
सत्रह वर्षों की इस यात्रा में हम बहुत कुछ साथ लेकर चले हैं — बातें... मुलाकातें... रूठना... मनाना... हंसी के ठहाके.. चुप्पियों की भाषा.. और सबसे बढ़कर — एक ऐसी दोस्ती, जिसने समय... दूरी... और अस्वीकार को भी पार कर लिया।
मैं जानता हूं, तुम्हें अपना बनाना अब भी मेरा सपना है। और शायद यही वो एकतरफा प्रेम है जो तुम्हारे 'ना' के बावजूद आज भी हंसता है, जीता है, और तुम्हारे दोस्त कह देने भर से संजीवनी पा जाता है।
लेकिन मैं यह भी जानता हूं कि तुम्हारा 'ना' कोई दीवार नहीं है — बल्कि एक खिड़की है, जिसमें से रौशनी आती है, उम्मीद की... एहसास की.. और शायद एक दिन स्वीकार की भी।
मैं नहीं जानता कब...
पर मुझे यकीन है — एक दिन तुम पलटोगी...
और यह कहोगी —
हां, यही तो था जो बरसों से मेरे साथ था...
हर वक्त, हर मोड़ पर, हर एहसास में...।
पहली दफा खुदा से मांग रहा हूं कि वह दिन जल्दी आ जाए... अगर ऐसा हो जाए तो मुझ जैसे मुल्हिद (नास्तिक) को भी खुदा के अस्तित्व पर यकीन हो जाए। यह मेरी नहीं खुदा को अपना अस्तित्व बचाने का इम्तिहान है।
जिस दिन ऐसा हो गया...
जिस दिन... प्यार.. मोहब्बत से आगे.. बहुत आगे....
जब मेरी तरह तुम्हें भी 'इश्क' का एहसास होगा..
उस दिन..
अहा !!
वह दिन सिर्फ इश्क़ का दिन नहीं होगा —
वह दिन होगा रूह के मिलने का...,
इस अधूरी प्रेम कहानी के मुकम्मल हो जाने का...
जो आज तक सिर्फ दिल की धड़कनों में जिंदा थी..।
उस दिन बारिशें होंगी..
तूफान आएगा...
दिल में लहरें मचलेंगी...
उस दिन के आने तक,
जीवन की आखिरी सांस तक,
मैं तुम्हारे सामने वही पुराना दोस्त बनकर खड़ा रहूंगा —
जिसकी आंखों में अब भी तुम्हारे लिए वही पहली वाली मासूमियत,
वही परिपक्व प्रेम और वही अंतहीन इंतज़ार होगा।
उस दिन हम गले लगेंगे...
तब शायद ये प्रेम कहानी मुकम्मल होगी...
और फिर हम
दुबारा जी भरकर गले लगेंगे...!!
या फिर,
जैसे अब तक जीता आया हूं —
इश्क़ को दोस्ती की चुप्पी में लपेटकर
मैं उम्र भर जी लूंगा।
तुम्हारा ही —
सिर्फ दोस्त कह देने भर से जि़ंदा रहने वाला
पर पूरी रूह से मोहब्बत करने वाला !!
HAPPY FRIENDSHIP DAY
(30 July)