Sunday, January 25, 2026

मैं ख्वाहिशों के अज़ाब लेकर चला गया हूं...


मैं ख्वाहिशों के अज़ाब लेकर चला गया हूं,

वो दिल वो खाना ख़राब लेकर चला गया हूं !


मैं छोड़कर अपनी राह तकती उदास आँखें,

जो बच गए थे, वो ख़्वाब लेकर चला गया हूं !


जिस पे मैंने मोहबत्तों की वही लिखी थी,

वो एक ममनून किताब लेकर चला गया हूं !


बस एक अजल को सुना गया हूं जो दास्ताँ थी,

मैं ज़िन्दगी से हिसाब लेकर चला गया हूं !


मैं काफिलों को दिखा गया हूं निशाने मंज़िल,

मैं रास्तों के सराब लेकर चला गया हूं !


उन्हें कहो के मैं ढूंढने से नहीं मिलूँगा, 

मैं गर्दे राह की नक़ाब लेकर चला गया हूं !!


✍️ खलील उर रहमान क़मर