मैं ख्वाहिशों के अज़ाब लेकर चला गया हूं,
वो दिल वो खाना ख़राब लेकर चला गया हूं !
मैं छोड़कर अपनी राह तकती उदास आँखें,
जो बच गए थे, वो ख़्वाब लेकर चला गया हूं !
जिस पे मैंने मोहबत्तों की वही लिखी थी,
वो एक ममनून किताब लेकर चला गया हूं !
बस एक अजल को सुना गया हूं जो दास्ताँ थी,
मैं ज़िन्दगी से हिसाब लेकर चला गया हूं !
मैं काफिलों को दिखा गया हूं निशाने मंज़िल,
मैं रास्तों के सराब लेकर चला गया हूं !
उन्हें कहो के मैं ढूंढने से नहीं मिलूँगा,
मैं गर्दे राह की नक़ाब लेकर चला गया हूं !!
✍️ खलील उर रहमान क़मर
