Tuesday, December 2, 2025

अटकी सांसों की मुलाक़ात

सुबह की पहली किरण खिड़की पर फिसलती आई थी, लेकिन उसके दिल की गहराइयों में अब भी रात का अंधेरा पसरा था। वह बिस्तर पर बैठा मोबाइल स्क्रॉल कर रहा था, तभी एक पोस्ट पर नजऱ अटक गई -

"रिश्तों में मर्म बना रहे, इसके लिए ज़रूरी है कि आपकी याददाश्त थोड़ी कमज़ोर हो।

जीवनपथ पर हम अपने अपनों से ही कई बार गलतियां कर बैठते हैं।

अगर उन्हें याद रखा जाए तो रिश्ते कमजोर हो जाते हैं।

बेहतर है उन गलतियों को भूल जाओ।

जैसे भोजन के निवाले में कड़वाहट आते ही उसे तुरन्त बाहर निकाल देते हैं,

वैसे ही कड़वे अनुभवों को भी याददाश्त से बाहर निकाल देना चाहिए।"

इन पंक्तियों ने जैसे उसे भीतर तक हिला दिया।

उसने उसी क्षण एक फैसला कर लिया - 

आज वह उससे मिलेगा। 

आज वो 18 सालों की दोस्ती, प्यार, तकरार और गलतफहमियों पर जमी धूल को साफ करेगा। 

आज वह सारे गिले-शिकवे खत्म करेगा।

***

वह लंबी दूरी तय करके आया था।

उसने सोचा था, लड़की उसे देखकर मुस्कुराएगी,

पर 

अपनी टेबल पर काम करते हुए लड़की अचानक उसे देखकर चौंक गई।

उसकी आंखों और चेहरे पर थकान थी,  न नजरों में नरमी थी, न आवाज में।

बस वही पुरानी नाराजगी, जो महीनों से उसकी सांसों में कांटे की तरह चुभ रही थी।

लड़की ने उससे बात भी नहीं की।

बस अपने काम में व्यस्त हो गई।

वह बोला - आज मैं अपनी सफाई देने नहीं आया।

आज सिर्फ तुम्हारी शिकायतें सुनने आया हूं।

उसकी आवाज़ में एक थरथराहट थी।

न जाने ठंड की, न जाने डर की।

लड़की ने पहले कुछ नहीं कहा। उसकी खामोशी में तूफान बसा था।

बस अपने काम में व्यस्त होने का नाटक किया।

लेकिन उसके हर छुपे हुए कंपन को लड़का पहचानता था।

आखिर 18 साल की दोस्ती कोई छोटी उम्र नहीं होती।

कुछ पल बाद उसने बोलना शुरू किया।

धीरे-धीरे, रुक-रुक कर, मगर सच्चाई से भरी हुई।

उसने अपनी सारी शिकायतें, अपना सारा गुस्सा, सारी तकलीफें एक-एक करके सामने रख दीं।

और लड़का - चुपचाप सुनता रहा। उसकी गर्दन झुक गई थी। 

क्योंकि आज की मुलाक़ात में उसका किरदार उत्तर का नहीं, सुनने का था।

जब लड़की बोल रही थी, वह उसकी बातों में खो गया था। 

कहीं बीच में, अनजाने में (या फिर सोच-विचारकर) उसने अपने हाथ जोड़ लिए थे।

एक पल उसके पैर भी देखे-

जैसे आंखें उन पैरों को छूकर कह रही हों,

मुझसे ग़लतियां हुईं,

मुझे माफ़ कर दो।

लड़की ने यह सब नोटिस नहीं किया,

और शायद अच्छा ही हुआ-

कुछ माफियां शब्दों से नहीं,

नजऱ झुकाने से पूरी होती हैं।

महीनों से लड़की के संवाद बंद थे।

उसने कहा- तुम्हारे बात बंद करने से मैं घुटन में जी रहा हूं।

कई बार ऐसा लगता है,

जैसे सांस ही नहीं ले पा रहा।

जैसे उसके फेफड़ों में हवा की जगह

उदासी भर गई हो।

आज उससे मिलकर जैसे वह दुबारा सांस लेना सीख रहा था।


"इंसान गलतियों का पुतला है",

उसने रुखाई से कहा।

और मैं भी इंसान ही हूं।

गलतियां मुझसे हुईं,

पर माफी मांगना मैंने नहीं छोड़ा।

मैं उस दिन के लिए... 

और उस दिन के लिए भी.. 

कल के लिए.. 

आज के लिए ... 

हर दिन के लिए 

तुमसे माफी मांगता हूं।


उसकी आवाज़ टूटी हुई थी।

किसी बच्चे की तरह,

जो अपनी सबसे प्यारी चीज़ खो देने से डर रहा हो।


दोनों के बीच एक अनकहा सन्नाटा पसर गया।

लेकिन यह सन्नाटा दूरियों वाला नहीं था—

यह वही सन्नाटा था जिसमें रिश्ते दोबारा जन्म लेते हैं।


मुलाक़ात खत्म करने से पहले लड़की ने चाय मंगवा दी थी। 

उस गर्म चाय में एक अजीब-सी मिठास थी, शायद नाराजग़ी के कण पिघल रहे थे।

लड़की की रूह जानती थी - वह खरा है, सच्चा है, पछता रहा है।

अंत में लड़का उठने लगा तो कुछ कहने के लिए रुका।

फिर मुस्कुराकर बोला—

एक ज़रूरी बात कहना भूल गया था-

तुम्हें पता है ना ?

वही बात

जो मैं अक्सर कह नहीं पाता?

लड़की ने नजरें झुका लीं।

वह जानती थी,

पर फिर भी सुनना चाहती थी।

लड़के ने धीमे से कहा—

तुम बहुत अच्छी हो।

बहुत ज़्यादा।

सबसे ज़्यादा।

फिर कुछ कदम चलकर पलटा और जैसे अपनी रूह उतारकर शब्दों में रख दी—

ऐ-अजीज़-ए-जान लड़की

तुम मेरे लिए 

इस सदी की,

इस दुनिया की,

सबसे खूबसूरत रूह हो।


और यही कहकर वह चला गया।

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