Monday, November 17, 2025

लिखा हुआ सब... एक दिन रद्दी हो गया..

मैंने 17 सालों से तुम्हारी इबादत सी की है। किसी के दिल में झांकने के लिए 17 साल की अवधि कम तो नहीं होती। एक तिहाई जीवन ही मान लो। फिर भी मैं आज तक तुमको लेकर ठीक से कयास नहीं लगा सका कि तुम्हारे दिल में क्या है..। जब इतना चाहने के बाद भी जब मैं तुम्हारे दिल अपने लिए कोई जगह नहीं बना सका, तो मुझे अब ठहर जाना चाहिए।

तुम्हारे प्रति अटूट प्रेम की भावनाओं को व्यक्त करने के लिए जो कुछ मेरे से हो सका, मैंने किया। जितना कह सकता था। कहा। जितना लिख सकता था। लिखा।

वो कहते हैं ना कि -

जहां तक मुमकिन था, कहानी सुनाई गई, 

जब गला भर आया तो कलम उठाई गई।

अपने शब्दों की ताकत पर बहुत 'गुरूर' था मुझे। हो भी क्यों नहीं, जिसने भी इन शब्दों को पढ़ा, उसे तुमसे ईष्र्या हो गई। यह अच्छे मालूम है मुझे। मैंने भी ठान रखा था,

इतनी गहराई से लिखूंगा, अपने लफ्ज में तुमको..

कि पढऩे वाले को तलब हो जाएगी, तुम्हें देखने की..

हर कहानी पर मुझे लगता इस बार तो तुम पढ़कर मेरे प्यार में पड़ जाओगी। उसमें नहीं तो इस बार तो तुम दौड़कर मेरे पास चली आओगी। इस बार नहीं तो उस बार.. उस बार नहीं हर बार... तुम पर मेरे किसी शब्द ने असर नहीं किया। तुमने हर कहानी पढ़ी पर तुम नहीं पिघली। इतना सख्त दिल किसी इंसान में होगा, यकीन नहीं होता। हालांकि तुमने एक दिन कहा था कि मुझ पर तुम शब्द खर्च मत करो। मगर मैं ही नहीं समझ पाया कि वह सच था। किसी किसी को मैंने चलते फिरते दो लाइनें ही कह दी तो वह आज दिन तक मुझे उन लाइनों के कारण याद करता है और यहां जब तुम्हारे लिए मैंने कथाएं रच दी, पर सब बेअसर रहा। किसी एक भी शब्द पर तुमने गौर नहीं किया। 

तुम फिर भी नहीं समझी, मेरी मोहब्बत की गहराई को,

मैंने तो हर वो लफ्ज लिख दिया, जिसका मतलब मोहब्बत होता है।

लिखा हुआ सब... एक दिन रद्दी हो गया.. 

कुछ इस तरह, मेरा यह गुरूर चकनाचूर हो गया।

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